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Rocketry Movie Review: माधवन ने बनाई ऑस्कर में जाने लायक फिल्म, कहानी उस साजिश की जिसने देश को पीछे धकेल दिया

सिनेमा मेरा जुनून रहा है। फिल्में देखना, उनके बारे में लिखना, फिल्मों के बारे में चर्चा करना, उन पर होनी वाली बहसों में हिस्सा लेना और फिल्में बनाना भी, ये सब बीते कई दशकों से मेरी दिनचर्या का हिस्सा है। किसी फिल्म को उसके बीज से लेकर पूरे वृक्ष के रूप में विकसित होते देखना और फिर उस फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने की जद्दोजहद का गवाह बनना, एक अलग ही अनुभव है। ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ को देखना उन पलों को बार बार जीने जैसा है, जो मेरे जीवन का बीते तीन चार साल से हिस्सा रहे हैं। फिल्म का पहला कट बनकर तैयार हुआ तो मैंने ये फिल्म उन नांबी नारायणन के साथ बैठकर देखी जिन पर ये फिल्म बनी है। सामने परदे पर फिल्म चल रही थी, देखने वालों में हम सिर्फ दो, मैं और नांबी नारायणन। मैं आम दर्शक की तरह भावुक होकर अपने आंसू रोकने की कोशिश रहा था और हैरान इस बात पर हो रहा था कि अपनी ही कहानी परदे पर देख मेरी बगल वाली सीट पर बैठा देश का नामचीन अंतरिक्ष वैज्ञानिक भी सुबक रहा है। फिल्म ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ उन सभी जुनूनी लोगों की कहानी है जो अपने हुनर को अपना हौसला बनाते है, घर परिवार सब किनारे धकेल अपना सब कुछ काम में लगा देते हैं। ये फिल्म उन लोगों की भी कहानी है जिन्हें ऊपर जाता देख उनके आसपास के लोग ही पीठ में छुरा घोंप देते हैं। ये कामयाबी की तरफ बढ़ते एक जुनूनी इंसान की ऐसी कहानी है जिसे गलत आरोपों में फंसाकर उसे सलाखों के पीछे और देश को बरसों पीछे कर दिया गया। ये फिल्म आपको बताती है कि अगर नांबी नारायणन को तब साजिशन जेल में ना डाला गया होता और उनके अंतरिक्ष विज्ञान पर किए गए काम को अटकाया न गया होता तो आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) विश्व की नंबर वन स्पेस एजेंसी होती। जी हां, नासा से भी आगे। नासा की नौकरी ठुकराकर ही तो अपनी मिट्टी के लिए कुछ कर दिखाने का जज्बा रखने वाले नांबी भारत लौटे थे। ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ नांबी नारायणन के साथ हुए अन्याय की ही कहानी नहीं है, ये कहानी है पूरे देश के साथ हुए अन्याय की जिसके चलते हम अंतरिक्ष विज्ञान मे चौथाई सदी से भी ज्यादा पीछे चल रहे हैं।

नांबी नारायणन की कहानी ऐसी है कि इस पर अब तक किसी दिग्गज फिल्म निर्माण कंपनी ने फिल्म क्यों नहीं बनाई, ये सोचकर अचरज होता है। मैंने गुरुवार को फिल्म के बारे में सोशल मीडिया पर लिखा तो लोग पूछने लगे कि फिल्म थिएटर में आएगी या ओटीटी पर। 1 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ को अकेले अपने बूते लिखने वाले, प्रोड्यूस करने वाले, निर्देशित करने वाले और उसमें अभिनय करने वाले आर माधवन इस बीच खूब गालियां भी खाते रहे हैं। मोबाइल पर दिन रात टिके रहने वाले लोगों के निशाने पर आते रहे। लेकिन, दर्शकों को तो छोड़िए, पूरे फिल्म जगत के तमाम बड़े सितारों ने भी फिल्म की रिलीज तक इसके बारे में एक भी शब्द अब तक तारीफ का नहीं कहा है। क्यों? क्योंकि इससे एक ऐसी नई फिल्म कंपनी खड़ी हो सकती है जिसे सिनेमा के वंशानुगत तौर तरीकों से कुछ लेना देना नहीं है और जो अपने बूते देश प्रेम की कहानियां बनाना चाहती है। एक तरह से देखा जाए तो माधवन एक तरह से नांबी नारायणन का दर्द ही बीते चार पांच साल से जी रहे हैं।
‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ शुरू होती है नांबी नारायणन की जवानी से। एक हुनरमंद वैज्ञानिक की प्रतिभा को विक्रम साराभाई पहचानते हैं। ए पी जे अब्दुल कलाम भी साथ काम करते दिखते हैं। दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से एक प्रिंस्टन में नांबी पढ़ने जाते हैं। नासा में नौकरी पाते हैं लेकिन उससे कहीं कम वेतन देने वाले इसरो में लौट आते हैं। उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने वाला रॉकेट वह विकसित कर रहे हैं। रॉकेट बनाने में वह कामयाब भी हो जाते हैं। रॉकेट का नाम है वीआई एएस। टेस्टिंग सफल होती है तो अपने गुरु के नाम का ‘के’ वह जाकर बीच में लिख देते हैं और रॉकेट का नाम पड़ता है, विकास। ये विकास रॉकेट ही आज तक इसरो से भेजे जाने वाले उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जा रहा है। और, इन्हें बनाने वाला? फिल्म की रिलीज के दिन तक नांबी नारायणन मुंबई में आर माधवन का इस बात के लिए हौसला बंधा रहे थे कि अंत में सब कुछ ठीक हो ही जाता है। ठीक फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में शाहरुख के बोले संवाद की तरह। शाहरुख फिल्म में नांबी नारायणन का इंटरव्यू ले रहे हैं और इसी इंटरव्यू के बहाने ये पूरी फिल्म आगे बढ़ती है।
अगर आपको देश से प्यार है, और थोड़ी बहुत विज्ञान की भी समझ है तो फिल्म ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ आपके लिए एक ऐसा एहसास है जिसे आप कभी भूल नहीं पाएंगे। इस फिल्म को माधवन ने अपना कर्तव्य समझकर बनाया है। कोरोना लॉकडाउन के दौरान उन्हें इस फिल्म को सीधे ओटीटी में बेच देने के जो लुभावने ऑफर मिले, उन्हें माधवन ने मान लिया होता तो फिल्म की रिलीज पर वह भी दूसरे निर्माताओँ की तरह विदेश में बैठकर ‘चिल’ कर रहे होते। लेकिन, माधवन ने ये फिल्म बड़े परदे के लिए सोची। इसके स्पेशल इफेक्ट्स और शूटिंग भी उसी दरजे के हैं। फिल्म के कलाकार भी उन्होंने चुन चुनकर कहानी में बुने हैं। नांबी नारायणन की पत्नी मीरा के रोल में माधवन की हिट तमिल फिल्मों की साथी सिमरन हैं। नांबी पर जो गुजरी और उसका असर भारतीय समाज से सीधे जुड़ी एक गृहिणी पर कैसा होता है, सिमरन ने जीकर दिखाया है। और, निर्माता और निर्देशक के रूप में अव्वल नंबर पाने के बाद माधवन ने बतौर अभिनेता भी जो इस फिल्म में कर दिखाया है, शायद ही अब वह कभी किसी दूसरी फिल्म में कर पाएं। एक सीन है फिल्म का। पूरा दर्द निचोड़ देने वाला। बारिश हो रही है। भीषण। तिरंगा भीग रहा है। इसी के नीचे हैं नारायणन दंपती। सड़क पर। बेसहारा, बेबस और बेजुबान।

सिनेमा के साथ भी, सिनेमा के बाद भी: फिल्म ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ एक ऐसी कहानी है जिसमें देश की किसी दिग्गज फिल्म कंपनी ने पैसा नहीं लगाया है। तमाम दिग्गज फिल्म वितरक कंपनियों ने जब इसे देश के शहर शहर पहुंचाने में माधवन का साथ नहीं दिया तो ये फिल्म यूएफओ मूवीज रिलीज कर रही है। देश की सियासत कैसे देश को बर्बाद करती रही है, ऐसी कहानी 1 जुलाई से लोगों के नजदीकी सिनेमाघरों में पहुंच रही है, ये अभी तक हिंदी फिल्में देखने वाले नियमित दर्शकों को पता तक नहीं है। माधवन अकेले ही इस सिस्टम से जूझ रहे हैं, ठीक वैसे जैसे कभी नांबी नारायणन खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए सिस्टम और न्यायपालिका से जूझ रहे थे। नांबी को इस झूठे केस में फंसाने वाला पुलिस अफसर अब जाकर तीस्ता सीतलवाड के मामले में गिरफ्तार हुआ है। केंद्र सरकार नांबी नारायणन को पद्मभूषण दे चुकी है, लेकिन उनके पास अगर आप कुछ मिनट भी बैठें तो उनका दर्द उनकी आंखों में अब भी छलक ही आता है। हो सकता है ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ के लिए भी माधवन को बतौर अभिनेता या निर्देशक या  निर्माता कल को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल जाए लेकिन इतना तय है कि जब भी ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ की बात चलेगी, एक आंसू माधवन की कोरों से भी छलकेगा जरूर।

फिल्म ‘रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट’ किसी सच्ची घटना से ‘प्रेरित’ फिल्म नहीं है। ये देश में एक अंतरिक्ष वैज्ञानिक के साथ हुए अन्याय की एक सच्ची घटना का दस्तावेज है। इसका एक एक फ्रेम और एक एक दृश्य माधवन ने हू ब हू वैसा ही बनाने की कोशिश की है जैसा नांबी नारायणन के साथ हुआ। नांबी नारायणन खुद इस फिल्म की मेकिंग से शुरू से जुड़े रहे हैं। अगर आपमें सच का सामना करने की हिम्मत है तो ये फिल्म जरूर देखिए। फिल्म उन सभी युवाओं को तो जरूर ही देखनी चाहिए जो देश के लिए कुछ करना चाहते हैं लेकिन मुसीबतों से डरते हैं। यकीन मानिए नांबी नारायणन ने जो झेला है, उसके आगे बाकी हर मुसीबत बौनी है।

रॉकेट्री: द नांबी इफेक्ट रिव्यू

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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