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फिल्म रिव्यू- जुग जुग जियो

ये फिल्म बताती है कि उम्र कोई बंधन नहीं है. अगर आप किसी रिश्ते में खुश नहीं हैं, तो आपको अलग हो जाना चाहिए. लोग क्या सोचेंगे! अगर आप भी यही सोचेंगे, तो लोग क्या सोचेंगे?

इस हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई है ‘गुड न्यूज़’ फेम राज मेहता की नई फिल्म ‘जुग जुग जियो’. ‘जुग जुग जियो’ एक फैमिली एंटरटेनर है. मगर ये एक बिखरती हुई फैमिली की कहानी है. वसीम बरेलवी का एक शेर है-

”शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते हैं. इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं.”

शायद आपने मुशायरे में सुना होगा. हमने कविता सेठ को गाते सुना था. ‘जुग जुग जियो’ को देखते हुए ये लाइन बार-बार मेरे ज़हन में आ रही थी. नहीं लिखता, तो तबीयत बिगड़ने की आशंका थी. ये समझते हैं कि ये लाइन इस फिल्म पर कैसे फिट होती है.

कुक्कू और नैना नाम का एक कपल है. लव मैरिज हुई. अब कैनडा में रहते हैं. मगर पांच साल तक शादी में रहने के बाद, अब वो दोनों एक दूसरे से तालाक लेना चाहते हैं. मगर कुक्कू की बहन की शादी है. इसलिए वो तय करते हैं कि फंक्शन खत्म होने के बाद ये खबर घरवालों के सामने ब्रेक करेंगे. वो शादी अटेंड करने पंजाब आते हैं. यहां आने के बाद कुक्कू को पता चलता है कि उसके पिता भीम, उसकी मां गीता को डिवोर्स देना चाहते हैं. क्योंकि उन्हें मीरा नाम की दूसरी महिला से प्यार है. मोटा-मोटी इतना समझिए कि इसमें से एक शादी टूटती है और एक बच जाती है.

इस फिल्म का बेसिक प्रेमाइज़ सिर्फ इतना ही है. कहानी को आगे बढ़ाने के लिए ड्रामा का फुल स्कोप है. और डायरेक्टर राज मेहता अपने राइटर्स की मदद से उसे पूरी तरह भुनाते हैं. कुक्कू को जबसे पता चला है कि उसके पापा, मम्मी से अलग होने जा रहे हैं. तो उस इनफॉर्मेशन को प्रोसेस नहीं कर पाता. बचपन में एक जोक सुना था. पांचवी-छठी क्लास के बच्चे आपस में बात कर रहे थे कि बच्चे कैसे पैदा होते हैं. इस दौरान क्लास का सबसे शाना बच्चा बताता है कि सेक्स करने से बच्चे होते हैं. ये सुनकर एक बच्चा हैरान हो जाता है. वो फटाक से कहता, यार पापा मम्मी के साथ ऐसा कर सकते हैं. हमारे यहां मम्मी-पापा को एक पेडेस्टल पर बिठा दिया जाता है. उनसे आप कोई ऐसी चीज़ एक्सपेक्ट नहीं करते, जो सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं है. तलाक वैसी ही एक चीज़ है.

और कुक्कू वही भोला बच्चा है. अंग्रेज़ी में उसे मैन चाइल्ड भी कहा जाता है. उसे लगता है कि पापा, मम्मी को डायवोर्स कैसे दे सकते हैं. उन्होंने साथ में 35 साल बिता लिए. अचानक से क्या हो गया. उसकी अपनी शादी बैकसीट पर चली जाती है. अब वो अपने पैरेंट्स की शादी बचाने में लग जाता है. बिना ये जाने कि उस शादी में मम्मी और पापा खुश भी हैं या नहीं. यहीं पर समझौते वाली बात प्लग इन करने का समय आ गया है. कुक्कू की मम्मी बताती हैं कि शादी में समझौते करने पड़ते हैं. समझौते से ही रिश्ते बचाए जा सकते हैं. कई सालों से वो ये समझौता खुद कर रही है. यही सलाह वो कुक्कू को भी देती हैं, ताकि उसकी और नैना की शादी भी बच जाए.

मगर कमाल की बात ये कि इस तरह की तमाम  बातों के बीच ‘जुग जुग जियो’ अपने कॉन्सेप्ट के प्रति वफादार बनी रहती है. जब मेकर को क्लीयर है कि उसे अपनी फिल्म के माध्यम से क्या कहना है, तो वो दर्शकों के लिए भी समझना आसान हो जाता है. नौजवान लोगों का तो ठीक है. मगर ये फिल्म बताती है कि उम्र कोई बंधन नहीं है. अगर आप किसी रिश्ते में खुश नहीं हैं, तो आपको अलग हो जाना चाहिए. लोग क्या सोचेंगे! अगर आप भी यही सोचेंगे, तो लोग क्या सोचेंगे? बेसिकली वो इस टॉपिक के इर्द-गिर्द एक कॉन्वर्सेशन शुरू करने की कोशिश करती है, जो कि अच्छी पहल है. काफी हद तक मच्योर और मॉडर्न भी.

‘जुग जुग जियो’ की दूसरी खासियत ये है कि वो गंभीर बात को सीरियस तरीके से ही कहने का लोड नहीं लेती. इस फिल्म की शुरुआत में एक सीन है, जब कुक्कू अपने ऐब्स पर मार्कर से लिखकर नैना को शादी के लिए प्रपोज़ करता है. कुक्कू का रोल किया है वरुण धवन ने और नैना बनी हैं कियारा आडवाणी. हमने जिस मार्क वाले सीन का ज़िक्र किया, वो बहुत क्रिंज सीन है. मगर आगे जाकर इसी फिल्म में एक कन्फ्रंटेशन सीन आता है, जहां कुक्कू और नैना अपने रिलेशनशिप के बारे में बात करते हैं. या यूं कहें कि लंबे समय से उनके भीतर जो गुबार भरा था, वो निकाल रहे हैं. ‘दिल धड़कने दो’ में एक डायलॉग है, जब कबीर का कैरेक्टर कहता है-

 ‘इस फैमिली में सब ऊपर ऊपर से बात करते हैं. असली बात तो कोई करता ही नहीं एक दूसरे से.’ 

इस सीन में कुक्कू और नैना वो ‘असली’ बात कर रहे हैं, जो आपको अमूमन हिंदी फिल्मों में देखने को नहीं मिलता. इस सीन में कियारा की परफॉरमेंस को उनके करियर के बेस्ट कामों में गिना जा सकता है. ‘भूल भुलैया 2’ में कियारा का काम देखने के बाद उनसे कुछ खास उम्मीद नहीं थी. मगर यहां वो बेटर करती हैं.

‘दिल धड़कने दो’ के ज़िक्र से ध्यान आया कि दोनों फिल्मों में निभाए अनिल कपूर के किरदार एक दूसरे से काफी मिलते-जुलते हैं. इस फिल्म में अनिल ने कुक्कू के पिता भीम सैनी का रोल किया है. ‘दिल धड़कने दो’ में सिर्फ अनिल का एक्सेंट फनी लग रहा था. ‘जुग जुग जियो’ में वो जो कुछ भी करते हैं, सबकुछ फनी लगता है. आई रिपीट सबकुछ. खासकर फिल्म के क्लाइमैक्स में. जब वो भरी सभा में जलील होने के दौरान कुक्कू के सॉरी के जवाब में इट्स ओके बोलते हैं. भयानक फनी कैरेक्टर और आला दर्जे की परफॉरमेंस.

‘जुग जुग जियो’ कभी प्रीची नहीं होती. शूजीत सरकार की फिल्मों में तकरीबन हर गंभीर सीन के बाद एक लाइट मोमेंट आता है, जो माहौल को हल्का करता है. ये चीज़ ‘जुग जुग जियो’ में भी देखने को मिलती है. जो फिल्म को कभी बोरिंग नहीं बनने देती. शूजीत सरकार को यहां सिर्फ उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल किया गया. उनका सिनेमा ‘जुग जुग जियो’ जैसी फिल्मों से बिल्कुल अलहदा होता है. खैर, नीतू सिंह ने इस फिल्म से अपना कमबैक किया है. वो कुक्कू की मां और भीम की पत्नी गीता के किरदार में दिखती हैं. उनके किरदार से इंडिया की अधिकतर महिलाएं रिलेट करेंगी. क्योंकि वो अपने घर की तो मालकिन नहीं है. मगर बड़ी सबमिसिव कैरेक्टर है. अंग्रेज़ी में एक कहावत है-

When someone shows their true colour, don’t try to paint a different picture. 

गीता भीम के साथ ये चीज़ बार-बार करती है. हालांकि अति किसी भी चीज़ की खराब होती है. आखिर में गीता को भी सच्चाई स्वीकार करनी पड़ती है. मगर जिस तरह से ये फिल्म खत्म होती है, आपको ज़्यादा उम्मीद रह नहीं जाती. नीतू को ज़्यादा स्क्रीनटाइम नहीं मिलता. सेकंड हाफ में उनका और कियारा का एक सीन है, जिसमें उन्हें परफॉर्म करते देखने का मौका मिलता है. इस फिल्म में अनिल कपूर के बाद किसी की परफॉरमेंस याद रहती है, तो वो हैं मनीष पॉल. हालांकि मनीष को एंकर के तौर पर इतनी देख लिया गया है कि आप उन्हें एक्टर के तौर पर एक्सेप्ट नहीं कर पाते. एक्सेप्टेंस फिल्म में भी मनीष के किरदार से जुड़ा बड़ा अहम मसला है. लुक आउट फॉर हिम.

हालांकि ‘जुग जुग जियो’ कुछ ऐसी चीज़ें भी करती है, जिसके बिना काम चलाया जा सकता था. कुछ सीन्स ऐसे हैं, जिन्हें फनी बनाने की कोशिश की गई है. बस वही वाले सीन्स फनी नहीं लगते. कुछ प्रॉब्लमैटिक चीज़ें भी हैं. मगर वो फिल्म जो कहना चाहती है, उसे खराब नहीं करतीं. इसलिए उन्हें आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. बस मुझे एक बात समझ नहीं आई. कुक्कू और नैना के अलग होने की रियल वजह क्या थी. फिल्म इस टॉपिक को कई बार छेड़ती है. मगर कभी सैटिसफैक्ट्री जवाब नहीं देती.

ओवरऑल ‘जुग जुग जियो’ एक फन फिल्म है. जिसे अपनी फुल फैमिली के साथ जाकर देखा जा सकता है. साफ-सुथरी कॉमेडी फिल्म, जो एक कायदे का मैसेज देती है. वो मैसेज आप तक सही से पहुंचता है कि नहीं, उसकी ज़िम्मेदारी आपकी है.

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